Wednesday, 28 February 2018

विलक्षण पेड़ : चायदानी बाओबाब

    देश-दुनिया अजब-गजब करिश्मों से लबरेज है। बात चाहे पर्यावरण की हो या झील-सरोवर या फिर पर्वत श्रंखला की हो.... करिश्मों की कहीं कोई कमी नहीं।

  पर्यावरण संवर्धन के साथ साथ पेड़-पौधों में विलक्षणता भी दिखती है। वट वृक्ष सहित अनेक पेड़ों की आैसत आयु की भी कोई सीमा नहीं। मेडागास्कर का एक शानदार पेड़ अपनी खास खूबियों के कारण देश-दुनिया खास चर्चित हो गया। 
 इस शानदार पेड़ की प्रजाति दुनिया में केवल मेडागास्कर में ही पायी जाती है। विशेषज्ञों की मानें तो विलक्षण पेड़ की यह प्रजाति एक हजार वर्ष से भी पुरानी है। मेडागास्कर में इस विशेष पेड़ को 'चायदानी बाओबाब" के नाम से जाना पहचाना जाता है।
    खास बात यह है कि यह विशालकाय पेड़ अस्सी मीटर या इससे भी कहीं अधिक लम्बे होते हैं। इसका आकार नीचे अर्थात पेड़ू से पच्चीस मीटर तक चौड़ा होता है। हालांकि सामान्यत: चौड़ाई दस मीटर होती है लेकिन यह सब पेड़ के आकार प्रकार पर निर्भर करता है। सामान्यत: पेड़-पौधों को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए पेड़ों को पानी देना होता है लेकिन 'चायदानी बाओबाब" की खूबियां कुछ अलग हैं। इसका जड़ समूह स्वयं पानी का उत्सर्जन करता है।
    सूखा के मौसम में यह पानी देता है। सूखे के मौसम में इस पेड़ के आसपास कहीं भी सूखा नहीं दिखेगा क्योंकि इसका जल रुाोत भूमि को अपेक्षित नमी प्रदान करता है। 'चायदानी बाओबाब" छाया भी देता है तो फूल भी देता है लेकिन इसके फूलों का जीवन केवल चौबीस घंटे ही रहता है। फूल चाहे तोड़ लिये जायें या फूल पेड़ में ही लगे रहें।
    इस अवधि के बाद फूल मुरझा जाते हैं। इन फूलों को मेडागास्कर के सौ फ्रैंक नोट में स्थान दिया गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों की नजर में दुनिया में पेड़ों के समूह के सबसे करिश्माई समूह में से एक है। इसमें वर्ष के अधिकतर समय पत्तियों का आच्छादन रहता है। इसका तना मोटा व फूला हुआ होता है। लिहाजा यह इंसानी आवश्यकताओं के लिए उपयोगी भी साबित होता है।
      आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कई बार इलाकाई बाशिंदे इसको अपना आशियाना भी बना लेते है। इसके शीर्ष भाग पर ही पत्तियों का आच्छादन होता है। इसका रंग हल्का ब्रााउन एवं सुुनहरा होता है। इसका विशिष्ट रंग भी दर्शकों को खास लुभाता है। इस पेड़ में खुरदरापन कम ही होता है। पेड़ का अधिकतर हिस्सा चमकदार व चिकना होता है। 
    खास बात यह है कि लकड़ी होने के बावजूद ज्वलनशील नहीं है। इसमें आग प्रतिरोधी क्षमता होती है। लिहाजा इसमें आग नहीं लगती है। हालांकि मेडागास्कर में अब इस प्रजाति को पर्यावरण की लुप्त प्रजाति में माना जाता है फिर मेडागास्कर में चायदानी बाओबाब पेड़ों की लम्बी श्रंखला खड़ी हैं। खास खूबियों के कारण चायदानी बाआबाब को मेडागास्कर में सर्वाधिक पसंदीदा पेड़ माना जाता है।

खूबियों वाली शैम्पेन पुल झील

   सौन्दर्य की इबारत लिखने में विश्व की जलधारायें भी पीछे नहीं। जी हां, जल अर्थात पानी का रंग हमेशा श्वेत-सफेद ही पाया गया लेकिन प्राकृतिक धरोहरों की श्रंखलाओं ने इस सच को भी अक्सर झुठलाया। न्यूजीलैण्ड की 'शैम्पेन पुल झील" भी कुदरती करिश्मों से लबालब है। 

  इस झील की एक धारा के जल का रंग हमेशा रंगीन नारंगी रहता है तो वहीं इसकी जलधारा में हमेशा शैम्पेन की तरह बुलबुला उठता रहता है। शायद इसीलिए इसे 'शैम्पेन पुल झील" के नाम से जाना जाता है।
  न्यूजीलैण्ड में रोटोरुआ से दक्षिण करीब तीस किलोमीटर फासले पर स्थित यह कुदरती झील विश्व के लिए एक अजूबा है। तोपो से उत्तर दिशा में करीब पचास किलोमीटर की दूरी पर यह विलक्षण झील दिखेगी।
    नारंगी जलधारा वाली यह कुदरती झील करीब नौ वर्ष पहले अस्तित्व में दिखी। करीब बासठ फुट गहरी व करीब पैंसठ फुट लम्बी इस विलक्षण झील को देखने देश दुनिया के असंख्य पर्यटक आते है। इस झील का जल दायरा करीब 18 लाख घनफुट है। इसकी सतह का जल तापमान करीब 74 डिग्री सेल्सियस रहता है जबकि झील का सामान्य जल करीब 260 डिग्री सेल्सियस तक पहंुच जाता है।
    झील के पानी में हमेशा बुलबुला उठता रहता है। उत्तरी द्वीप की इस झील-झरना में रासायनिक गैसों का भारी भण्डारण उपलब्ध है। इसमें हाइड्रोजन, हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन, आर्सेनिक, सल्फाइड आदि गैसों का प्रचुुर भण्डारण है। इतना ही 'शैम्पेन पुल झील" के आसपास के पहाड़ों में बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता भी पर्याप्त तादाद में है। 
   इन पहाड़ी इलाकों में पारा, थैलियम के अलावा सोना व चांदी की भी उपलब्धता है। इस विलक्षण झील का जल किसी तरल पदार्थ की भांति दिखता है तो झील में जल का प्रवाह उबलता हुआ दिखता है। ऐसा एहसास होता है कि अभी जलधारा से विस्फोट हो जायेगा।
    इस झील का जल गिलास में भर लेने से शैम्पेन की भांति झाग के साथ फैलता दिखता है। न्यूजीलैण्ड के भू वैज्ञानिक इसकी विलक्षणता का अध्ययन कर रहे हैं।

Tuesday, 27 February 2018

वैटिकन सिटी दुनिया का छोटा पर खूबसूरत देश

   आबादी करीब नौ सौ व क्षेत्रफल करीब 44 हेक्टेयर। जी हां, दुनिया के सबसे खूबसूरत देश व राज्यों में गिना जाने वाला 'वैटिकन सिटी" खासतौर से 'सीमित" होने के बावजूद 'अत्यधिक" विस्तृत है।

    'वैटिकन सिटी" को दुनिया में एक स्वतंत्र देश-राज्य की मान्यता है। इसका अपना कानून, अपना सैन्य बल, अपनी राजभाषा, अपनी मुद्रा सहित बहुत कुछ अपना है। देश के बाशिंदों को खुद पासपोर्ट भी जारी करता है।
  हालांकि इस देश को अस्तित्व में आये अभी सौ वर्ष पूर्ण नहीं हो सके। फिर भी इस विलक्षण देश को दुनिया में जाना जाता है। 'वैटिकन सिटी" यूरोपीय महाद्वीप का एक विशिष्ट देश है। विशेषज्ञों की मानें तो वैटिकन सिटी धरती के सबसे छोटे देशों में से एक है। चिट्टा डेल वैटिकानो से इस शहर के जन्म को माना जाता है। इसका क्षेत्रफल करीब चवालिस हेक्टेयर है जबकि आबादी करीब नौ सौ आकंलित है। 
  'वैटिकन सिटी" इटली के रोम शहर के अंदर स्थित है। इसकी राजभाषा लैटिन है। ईसाई धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक चर्च का यहीं केन्द्र है। 'वैटिकन सिटी" के मध्य में सैन पियेत्रे भव्य-दिव्य हाल है। इसी हाल से धर्मगुरु पोप का उपदेश प्रसारित होता है। 'वैटिकन सिटी" में लैटिन के अलावा फ्रैंच व इटैलियन भाषा इस्तेमाल की जाती है।
    इस सम्प्रदाय के सर्वोच्च धर्मगुुरु पोप इसी देश में निवास करते हैं। यूं कहा जाये कि 'वैटिकन सिटी" रोम का छोटा सा हिस्सा है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। वैटिकन सिटी में सेंट पीटर गिरिजाघर, वैटिकन प्रासाद समूह, वैटिकन बाग सहित कई अन्य गिरिजाघर हैं।
    विशेषज्ञों की मानें तो 11 फरवरी 1929 को एक संधि के तहत इसे एक स्वतंत्र देश-राज्य के रुप में स्वीकार किया गया। इस देश के विश्व के सभी छोटे-बड़े देशों से राजनयिक संबंध हैं। वर्ष 1932 में रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया। 'वैटिकन सिटी" वास्तुकला का अप्रतिम व अनुकरणीय देश है। 
   वास्तुु का कलात्मक आयाम बरबस आकर्षित करता है। आकर्षक गिरिजाघरों, मकबरों, कलात्मक प्रासादों के साथ साथ संग्रहालयों व पुस्तकालयों की एक लम्बी श्रंखला है। खास बात यह है कि पोप के सरकारी निवास का नाम भी 'वैटिकन" ही है। रोम में वैटिकन पहाड़ी व टाइबर नदी के किनारे बसे 'वैटिकन सिटी" की बसावट अर्थात संरचना शिवलिंग पर आधारित दिखती है। यहां की सांस्कृतिक, धार्मिक व ऐतिहासिक परम्परायें विशिष्ट हैं।
   इस शहर की सजावट विश्व के नामचीन कलाकारों ने बड़े ही सलीके से की है। विशेषज्ञों की मानें तो एक समय था, जब रोम के निकटवर्ती प्रदेशों में चर्च शासन स्वीकार किया जाने लगा। वर्ष 1870 में इटली में पेपल स्टेट्स को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया गया। इससे इटली एवं चर्च के बीच तनावपूर्ण हालात पैदा हो गये। कारण रोमन कथोलिक चर्च अपने परामाध्यक्ष को ईसा का प्रतिनिधि समझ कर किसी राज्य के अधीन नहीं रहना चाहता। 
    सहमति-समझौता के आधार पर वर्ष 1929 में इटली व रोमन कैथोलिक चर्च की दिशायें तय हो गयीं। इसी के तहत संत पीटर के धर्म क्षेत्र के आसपास लगभग एक सौ नौ एकड़ भूमि उपलब्ध करा दी गयी। इस क्षेत्र को पूर्ण तौर पर स्वतंत्र मान लिया गया। इसी के साथ ही 'चिट्टा डेल वाटिकानो" अर्थात 'वैटिकन सिटी" का विश्व के एक नये देश के तौर पर उद्भव हुआ।
    वैटिकन सिटी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल है। वैटिकन सिटी अपने देश के बाशिंदों को पासपोर्ट जारी करने से लेकर सभी आवश्यक सेवायें-सुविधायें उपलब्ध कराता है। वैटिकन सिटी की आबादी भले ही नौ सौ के आसपास हो लेकिन यह देश दुनिया भर में फैले रोमन कैथोलिक चर्च का आध्यात्मिक संचालन करता है। 
     'वैटिकन सिटी" के पास अपनी डाक व्यवस्थायें हैं तो वहीं उसकी अपनी मुद्रा है। खास बात यह है कि वैटिकन सिटी की मुद्रा इटली में भी चलती है। इन्फारमेशन एण्ड टेक्नालाजी, डाक विभाग, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से लेकर वैटिकन सिटी का अपना सैन्य बल भी है। ईसाई धर्म के इस पवित्र शहर की संरचना हिन्दू धर्म के शिवलिंग के समान है।
     इस शहर का अवलोकन करने पर शिव के मस्तक का त्रिपुण्ड भी अवलोकित होता है। वैटिकन की उत्पत्ति भी वैदिक से मानी जा रही है। 'वैटिकन सिटी" छोटा राष्ट्र होने के बावजूद विकसित व सम्पन्न देशों में गिना जाता है। इस देश की इमारतें निश्चय ही वास्तुकला का अद्भूत उदाहरण हैं जिनको देखने का लोभ संवरण नहीं हो पाता। नक्काशी का शिल्प बरबस देखते ही बनता है।

केलिमुत्तू की विलक्षण क्रेटर लेक्स

    'सौन्दर्य" से लबरेज निराली छटा देश-दुनिया के अजब-गजब नजारों में खूब दिखेगी। सौन्दर्य शास्त्र को रेखांकित करने वाले प्राकृतिक नजारों की देश-दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं। 

    खास तौर से यह नजारे अजब-गजब भी... सौन्दर्य से लबरेज भी... आैर प्राकृतिक उपहार भी...। ज्वालामुखी विस्फोटक होने के साथ ही अब पर्यटन स्थल की शक्ल भी लेने लगे।
     इण्डोनेशिया के केलिमुत्तू ज्वालामुखी में भी दुनिया को कुछ ऐसा ही दिख रहा। केलिमुत्तू ज्वालामुखी क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदा ने विध्वंसक परिवेश को भी पयर्टन के सुन्दरता से भर दिया। केलिमुत्तू ज्वालामुखी के शिखर पर तीन विलक्षण झीलें हैं।
    विलक्षणता यह है कि इन झीलों का जल रंग हमेशा परिवर्तित होता रहता है अर्थात बदलता रहता है। यह विलक्षण झील अपने जल का रंग कभी लाल नीला तो कभी हरा व काला कर देती हैं तो चाकलेट-ब्रााउन रंग कर देती हैं। खास बात यह है कि एक ही स्थान पर होने के बावजूद इन झीलों के जल का तापमान एवं रासायनिक गुण विभिन्नता से परिपूर्ण हैं।
    इण्डोनेशिया की इन झीलों को 'केलिमुत्तू क्रेटर लेक्स" के नाम से जाना जाता है। इण्डोनेशिया के फ्लोरेंस द्वीप के निकट यह झीलें हैं। यह क्षेत्र इण्डोनेशिया की राजधानी से पूर्व के प्रांत नुसा तेगास में स्थित है। इस ज्वालामुखी के तीन शिखर हैं। इन शिखर पर ही झील स्थित हैं। इनमें एक झील को टीयू बुपुु कहा जाता है। इसे पुराने लोगों की झील के तौर पर देखा जाता है। अन्य दो झीलों को टीयू को नुवा तथा टीवू के नाम से जाना जाता है। इनको युवा पुरूषों व मेडन की झील कहा जाता है। यह मुग्ध करने वाली झीलें दुनिया के आकर्षण का केन्द्र हैं। 
   इण्डोनेशिया की यह विलक्षण झीलें ज्वालामुखी पर करीब 1640 मीटर ऊंचाई अर्थात शिखर पर हैं। अध्ययन में पाया गया कि इनके रासायनिक तत्व अलग-अलग हैं। सुन्दर झीलों का इण्डोनेशिया में यह अतिलोकप्रिय पर्यटन स्थल है। इण्डोनेशिया के भूवैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी सहित सम्पूर्ण क्षेत्र का अध्ययन किया तो जल रंग परिवर्तन सहित तमाम विलक्षणतायें मिलीं।
    इण्डोनेशिया ने केलिमुत्तू को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया है। यह क्षेत्र खनिज व रासायनिक सम्पदाओं से परिपूर्ण है। विशेषज्ञों की मानें तो झीलों के जल रंग परिवर्तन के साथ ही विभिन्न प्रकार की गैसों की उपलब्धता भी है।
   राष्ट्रीय उद्यान घोषित होने के बाद इस क्षेत्र में पर्यटकों को आवागमन की सहूलियत हो गयीं। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1915 में इन विलक्षण झीलों की खोज हुयी। एक क्षेत्रीय डच सैन्य अफसर बी वैन सचटेेलेन  ने पहली बार देखा था। विलक्षणता ने सैन्य अफसर का ध्यान आकर्षित किया। वर्ष 1929 में वाई बॉयमन ने इसका उल्लेख किया। 
     पर्यटकों के लिए निकट ही नियमित हवाई सेवायें उपलब्ध हैं। केलिमुत्तू ज्वालामुखी क्षेत्र में आवासीय सहूलियतें भी हैं जिससे पर्यटक आसानी से क्षेत्र में विश्राम कर सकते हैं। शहरी क्षेत्र से केलिमुत्तू तक पहंुचने में लगभग तेरह किलोमीटर की यात्रा करनी होती है। आम तौर पर पर्यटक 'सूर्योदय का सौन्दर्य" देखने के लिए लालायित रहते हैं क्योंकि सूर्योदय का सौन्दर्य भी विलक्षण ही होता है। लिहाजा अधिसंख्य पर्यटक क्षेत्र में रात्रि प्रवास करते हैं।

गुलाबी जल वाली हिलैयर झील

     देश-दुनिया-जहाँ की धरती प्राकृतिक सौन्दर्य... प्राकृतिक खजाना... प्राकृतिक उपहारों की श्रंखला से लबरेज दिख रही। प्राकृतिक धरोहरों व उपहारों की श्रंखला निश्चय ही मन मोह लेती है।

  इन अप्रतिम सौन्दर्य उपहारों के दिग्दर्शन के लिए देश-दुनिया के सौन्दर्य प्रेमी व पर्यटक खिचे चले आते हैं। पश्चिमी आस्ट्रेलिया की 'गुलाबी झील" (पिंक लेक) भी प्राकृतिक खजाना का दुनिया को एक अद्भूत उपहार है। 
  गुलाबी रंग के पानी वाली 'हिलैयर झील" का जल भले ही खारा हो लेकिन उसका सौन्दर्य मन को लुभाता है। दक्षिणी महासागर से ताल्लुक रखने वाली 'हिलैयर झील" की लम्बाई व चौड़ाई बहुत अधिक नहीं है फिर भी अपनी विशिष्टता के कारण देश-दुनिया में उसकी ख्याति है। करीब ढ़ाई सौ मीटर चौड़ी व लगभग छह सौ मीटर लम्बी इस विलक्षण झील में पानी की खासियत की एक लम्बी श्रंखला है।
   इस झील के चारो ओर रेत का फैलाव है। झील चौतरफा लकड़ी के जंगलों से घिरी है। इस जंगल में पेपरबर्क व नीलगिरी के पेड़ों की लम्बी श्रंखला है। इसमें वनस्पतियों के पेड़-पौधे हैं तो वहीं रेत के टीले बहुतायत में दिखेंगे। झील की सबसे बड़ी खासियत-विशेषता उसके पानी का रंग गुलाबी होना है। झील का यह जल किसी खास समय पर गुलाबी नहीं होता बल्कि इसका जल हमेशा गुलाबी रहता है।
     झील का यह जीवंत गुलाबी रंग स्थायी है। वर्षा या अन्य ऋतुओं का इस झील के गुलाबी पानी पर कोई असर या फर्क नहीं पड़ता। इस विलक्षण झील को खोजने वाले मैथ्यू पिलंडर्स थे। वर्ष 1802 में एक अभियान के दौरान उनकी नजर गुलाबी जल वाली इस विलक्षण झील पर पड़ी। शायद इसी लिए इस झील को 'पिलंडर्स पीक" भी कहा जाता है। अभिलेखों में 'गुलाबी रंग की छोटी झील" का उल्लेख मिलता है।
     विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1803 में पिलंडर्स ने एक बार फिर मध्य द्वीप का दौरा किया। इस बार पिलंडर्स अपने साथ इस गुलाबी झील का पानी पीपों में भर कर ले आये। इसके बाद इस विलक्षण झील के पानी के व्यावसायिक उपयोग पर शोध-खोज प्रारम्भ हुयी। व्यावसायिक संभावनाओं की जांच-पड़ताल में सामने आया कि इस पानी का उपयोग नमक बनाने के लिए भी किया जा सकता है। 
   इस पानी में हलोपलिक नमक व क्रुस्ट्स वैक्टेरिया भी पाये जाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो 19 वीं सदी में यह क्षेत्र नमक खनन क्षेत्र में था। पश्चिमी आस्ट्रेलिया के प्रशासन ने वर्ष 2012 में द्वीपसमूह नेचर रिजर्व संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। इस तटीय रेखा को अब मनोरंजक क्षेत्र घोषित करने की दिशा में प्रयास चल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि खारा तत्व व  खारा पानी होने के कारण जलीय जीव का कोई संकट होगा। 
  गुलाबी जल में जलीय जीवन भी पर्याप्त तादाद में हैं। इस गुलाबी जल से मनुष्य को कोई खतरा नहीं दिखता। इस झील में गुलाबी बबल गम भी देखे जा सकते हैं तो तटीय रेखा पर नमक की परत आसानी से देखी जा सकती है।

Monday, 26 February 2018

खौलते जल वाली डोमिनिका की ब्वॉइलिंग लेक

    'खौलता जल" किसी नदी-झील या जलाशय में अठखेलियां कर रहा हो तो निश्चय ही आश्चर्य होगा। जलधारा तो सामान्यत: 'शीतलता" का संदेश देती है लेकिन विश्व वसुंधरा तो अपने आगोेश में रहस्य-अचरज व आश्चर्य के खजानों की लम्बी श्रंखला छिपाये है।

  विश्व विरासत का डोमिनिका भी एक विलक्षण एवं अद्भूत स्थल है। डोमनिका के राष्ट्रीय उद्यान में उबलते-खौलते जल की भव्य-दिव्य झील है। खास बात यह है कि मौसम के बदलते तेवर का इस झील के जल पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
   डोमिनिका के मोरेन ट्रोइस पिट्नस राष्ट्रीय उद्यान में स्थित इस 'ब्वॉइलिंग लेक" को देखने आैर इसकी आब-ओ-हवा को देखने-अनुभव करने बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। यह खौलते जल वाली झील एक बड़े दायरे में है। इस झील के उपर आम तौर पर भाप के बादल छाये रहते हैं।
    झील का जल कभी शांत नहीं दिखता-रहता। झील का भूरा व नीला जल सदैव-हमेशा बुदबुदाता दिखता है। ऐसा प्रतीत होता है कि झील का जल खौल रहा हो। विशेषज्ञों की मानें तो इस विलक्षण झील को वर्ष 1870 में देखा गया। इस झील के निकट दो अंग्रेज वॉट एवं डाक्टर निकोल्स काम कर रहे थे, तभी उन्होंने इस झील की विलक्षणता को देखा।
   इसके बाद वर्ष 1875 में वनस्पति शास्त्री एच प्रेस्टोई व डा. निकोल्स ने इस प्राकृतिक घटना पर शोध व अध्ययन प्रारम्भ किया। जल के तापमान को मापा गया तो पाया गया कि इस खौलती झील का जल 197 डिग्री फारेनहाईट तक पाया गया। जल के निरन्तर खौलने के कारण झील के केन्द्र बिन्दु के जल का मापन संभव नहीं हो सका।
   इस झील की गहराई मे काफी उतार-चढ़ाव हैं। विशेषज्ञों की दृष्टि में 1870 के दशक में विलक्षण जल वाली यह झील काफी गहरी थी लेकिन वर्ष 1880 में अचानक एक बड़ा विस्फोट हुआ आैर झील लुप्त हो गयी। इस झील के स्थान पर गर्म जल व भाप का फव्वारा निकलने लगा। इसके लम्बे समय बाद यह स्थान एक बार फिर खौलते जल वाली भव्य-दिव्य झील में तब्दील गया। इस बार झील की गहराई कम हो गयी। अब तो हमेशा झील के जल  में एक सतत प्रवाह दिखता है।
   इस झील से विभिन्न प्रकार की गैस का उत्सर्जन होता है तो वहीं भाप के बादल करीब-करीब हमेशा ही दिखते हैं। इस झील का झरनों से भी जुड़ाव है लेकिन जल कहीं भी खौलता ही मिलेगा। खौलने की पृवत्ति वाली इस जलझील में तैरना मौत को दावत देना है। इस झील तक पहंुचने के लिए कोई सीधी सड़क नहीं है बल्कि सड़क से करीब 13 किलोमीटर घूम फिर कर उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर जाना होता है। फिर भी बड़ी संख्या में पर्यटक झील की विलक्षणता को देखने-महसूस करने आते हैं।
      पर्यटकों को नाश्ता व पानी खुद साथ लेकर आना-जाना होता है। इस विरानी घाटी में खतरनाक वृक्षवंश आदि की एक बड़ी व लम्बी चौड़ी श्रंखला है। डोमिनिका की इस झील व आसपास के इलाके के वायु मण्डल में सल्फर की पर्याप्त उपलब्धता है। सल्फर की गंध से इसे महसूस किया जा सकता है। उबलते जल वाली इस झील के प्रारम्भ से अंत तक करीब मोर्न निकोल्स की 3168 फुट लम्बी यात्रा करनी पड़ती है।
    विशेषज्ञ मानते हैं कि इस खौलते जल वाली झील के बेसिन अर्थात तल में पिघला लावा जैसा ज्वलनशील तत्व है। यह लावा गैसों का भी उत्सर्जन करता है। झील का भूरा व नीला जल खाना पकाने के लिए आसानी से उपयोग में लाया जा सकता है। इसे वीरानी की घाटी भी कहा जाता है।यह ब्वाइलिंग लेक ज्वालामुखी क्षेत्र में आती है। विशेषज्ञों की मानें तो साहसिक फिल्म निर्माता जॉर्ज कॉरआैनीस रस्सियों के सहारे इस झील को पार करने वाले पहले-प्रथम व्यक्ति बने। खौलते जल वाली यह ब्वाइलिंग लेक वैमांगु घाटी पर स्थित है।

Sunday, 25 February 2018

दुनिया का विलक्षण मंदिर शुआन खोंग

     दुनिया में कहीं कुछ भी असंभव नहीं। जी हां, बस इच्छाशक्ति होनी चाहिए। एक भिक्षु की इच्छाशक्ति ही थी कि दुनिया में अपने आकार-प्रकार के एक अद्भूत मंदिर का निर्माण हो गया। इसे हवा में खड़ा मंदिर भी कहा जाता है तो हवा में मठ के तौर पर भी जाना जाता है। 

  चीनी समुदाय में यह मंदिर  'शुआन खोंग" के नाम से ख्याति प्राप्त है। विश्व का यह अद्भूत एवं अद्वितीय मंदिर उत्तरी चीन के शानसी प्रांत की हंग पहाड़ी की एक खड़ी विशाल चट्टान पर स्थित है। भूमि तल से करीब पचहत्तर मीटर अथवा करीब ढ़ाई सौ फुट की ऊंचाई पर यह विलक्षण मंदिर लटकता दिखता है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो हंग पहाड़ी के इतिहास में इस मंदिर का निर्माण सोलह सौ वर्ष से भी अधिक समय पहले किया गया था। हालांकि इसके बाद इस भव्य-दिव्य मंदिर का कई बार विस्तार व सुधार किया जा चुका है। विशेषज्ञों की मानें तो हवा में लटकने वाले इस विशाल मंदिर की शुुरुआत लियाओ रान नामक भिक्षु ने की थी। अब यह मंदिर चीन के अति सुरक्षित प्राचीन स्थापत्य कला का अद्भूत उदाहरण है।
    यह मंदिर घनी एवं सघन पहाड़ियों की घाटी के एक छोटे से टुकड़े पर स्थित है। इस घाटी के दोनों ओर सौ-सौ मीटर ऊंचाई वाली सीधी पत्थर की चट्टानें हैं। मंदिर चट्टान पर जमीन से करीब पचास मीटर ऊंची सतह पर बना है। मंदिर के ठीक उपर पहाड़ी चट्टान का एक विशाल टुकड़ा बाहर की ओर लटकता दिखता है। विशाल चट्टान का यह टुकड़ा देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि बस अभी यह विशाल चट्टान मंदिर पर आ कर गिर जायेगी।
      इस विशाल मंदिर में चालीस से अधिक भवन व मण्डपम आदि हैं। इस मंदिर तक पहंुचने के लिए लकड़ी के बने रास्ते से होकर जाना पड़ता है। लकड़ी का यह रास्ता चट्टान से सटा होने के कारण हिचकोले तो नहीं खाता लेकिन पर्यटकों-दर्शको व श्रद्धालुओं की आवाजाही के दबाव से चरमराने जैसी आवाज होती है लेकिन इसके कहीं भी भय नहीं लगता। 
   यह मंदिर चीन के ताथोंग शहर से उत्तर--पश्चिम में करीब पैंठस किलोमीटर दूर है। ताथोंग में युनकांग गुफाओं के अलावा हवा में खड़ा मंदिर, एतिहासिक स्थलों व मुख्य पर्यटन स्थलों के आकर्षण का केन्द्र है। विशेषज्ञों की मानें तो यह चीन में अब तक सुुरक्षित एकमात्र बौद्ध, ताओ व कन्फ्युशियस धर्मों की मिश्रित शैली से बना अद्भूत मंदिर है।
       इसकी संरचना चट्टान में किये गये छेद में फिट ओक में रखे हुये के समान है। दुनिया की मशहूर पत्रिकाओं में सुमार टाइम पत्रिका ने इस मंदिर को दुनिया की दस सबसे अजीब व खतरनाक इमारतों में शामिल किया है। चीनी भाषा में इसे शुआन खोंग कहा जाता है तो अंग्रेजी में इस मंदिर को हैंगिंग टेम्पल के नाम से जाना जाता है। देश दुनिया के लाखों श्रद्धालु, पर्यटक व दर्शनार्थी मंदिर की विशिष्टता देखने आते है।

Sunday, 11 February 2018

इन्द्रधनुषी रंगों वाली कॉनो क्रिस्टिल्स नदी

   सौन्दर्य-लालित्य-माधुर्य, रहस्य-रोमांच का कहीं कोई अंत नहीं। जी हां, प्रकृति ने हमेशा दुनिया-धरती को अद्भुत उपहारों से लबरेज रखा।

  सौन्दर्य व लालित्य मन-मस्तिष्क के तारों को झंकृत कर देता है। सौन्दर्य व लालित्य का आकर्षण ही होता है, जो मीलों से पर्यटक एक झलक पाने के लिए भागते-दौड़ते चले आते हैं। 'पानी रे पानी" तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो लगे उस जैसा.... यह कथ्य-तथ्य व गुनगुनाना नैसर्गिक सौन्दर्य के सामने सटीक नहीं बैठता। 
  वैश्विक मानचित्र-पटल पर देखें तो पानी भी अपने वैशिष्ट्य से देश-दुनिया को आकर्षित करता है। जी हां, कोलम्बिया की नदी 'कॉनो क्रिस्टल्स" अपनी विशिष्टता के कारण देश-दुनिया में आकर्षण का केन्द्र बनी हुयी है। इस नदी का सामान्य पानी जुलाई से नवम्बर की अवधि में इन्द्रधनुषी रंग धारण कर लेता है। कोलम्बिया की इस नदी को दुनिया की सबसे सुन्दर नदी माना जाता है।
     कोलम्बिया के प्रांत मेटा में यह विशिष्ट नदी स्थित है। सेरानिया डे ला मॉकरेना के रुाोत वाली यह एक सहायक नदी है। मूलत: कॉनो क्रिस्टल्स गुयाबेरो नदी की सहायक नदी है। इस नदी व चट्टानों को दुनिया की सबसे पुरानी प्राकृतिक सम्पत्तियों में माना जाता है। यहां के पठार व चट्टानों की श्रंखला करीब 1.2 अरब साल पुराने माने जाते हैं। करीब सौ किलोमीटर लम्बी इस बहुआयामी कॉनो क्रिस्टिल्स नदी को आम तौर पर कोलम्बिया में पांच रंगों की नदी एवं इन्द्रधनुष रंगों वाली नदी भी कहा जाता है।
  इस नदी में झरनों की एक लम्बी श्रंखला है। इस नदी का जल एक विशेष अवधि-विशेष समय पर हरा, पीला, नीला, लाल व काला हो जाता है। खास तौर इस नदी का जल लाल हो जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस नदी का जल जुलाई से नवम्बर की अवधि में खास तौर से रंगीन होता रहता है। जल का रंगीन होने के एक बड़ा कारण विभिन्न प्रजातियों के पौधों को माना जाता है। 
     इस नदी में मैकरेनिया क्लाविगेरा प्रजाति के पौधे बड़ी तादाद में हैं। इस पौधे की रसायनिक प्रक्रिया के कारण ही जल का रंग बदलता रहता है। इस नदी की तलहटी खास तौर से कंकड़ व पथरीली चट्टानों वाली है लिहाजा जल की निर्मलता भी अद्वितीय है। इस नदी का जल भले ही रंगीन हो लेकिन निर्मलता विशेष रहती है। कोलम्बिया का यह क्षेत्र वर्षा वन क्षेत्र के रुप में जाना-पहचाना जाता है।
    इसका जल गर्म व शीतल होता है। यह परिवर्तन समय-समय पर होता रहता है। यह नदी शीतल जलचरों के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। इसमें पक्षियों की करीब चार सौ बीस प्रजातियां पायी जाती है। इतना ही नहीं उभयचरों की भी दस व सरीसृपों की 43 प्रजातियां संरक्षित हैं।
   'कॉनो क्रिस्टिल्स नदी" में जलीय पौधों की लम्बी श्रंखला पुष्पित-पल्लवित होती है लेकिन इस खूबसूरत नदी में मछलियां नहीं पायी जातीं। इन्द्रधनुषी रंगों वाली कॉनो क्रिस्टिल्स नदी दुनिया के लिए कौतुहल का विषय बनी है। पानी का रंग बदलने के कारण देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए कॉनो क्रिस्टिल्स नदी आकर्षण का केन्द्र बनी है।

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